तुम भी छह बार बदलते हो
भारी बारिश "कठोर" कर दे
कर दे "तर" तपता धूप
धूमिल, द्वंद, अछूते धुएं,
सब फ़िराक बने आसपास
घूम रहे होते हैं
और तुम छोड़ दो जो देखना
तो थपेड़े बारिश के बूंद के भी नहीं दिखेंगे, नहीं महसूस होगी
चित्कारी किरणें धूप की
साल के छह मौसम में
तुम भी छह बार बदलते हो ।
ठिठुरन, अंकुरित, उपजाऊ,
खिलना, मुरझाना, पतझड़, बसंत, इनमें से किसी एक से बैराग होने से
हो जाता तत्व द्वंद्व सा, धुंध सा, कुछ दलदल के दरिया सा,
तुम भी बदलते हो क्या
6 बार साल के 6 मौसम की तरह
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